दशामाता व्रत: पारिवारिक सुख-समृद्धि और स्थिरता का पर्व
होली के बाद कृष्ण दशमी पर किया जाने वाला पावन व्रत, जो परिवार की रक्षा, शांति और समृद्धि के लिए समर्पित है
तारीख
2029-03-11
दशामाता पूजा मुहूर्त
6:51 AM
मुहूर्त समय
दशामाता पूजा मुहूर्त (सूर्योदय)
शुरुआत समय: 6:51 AM
सूर्योदय का समय दशामाता पूजन, डोरा-विधि और पारिवारिक मंगलकामना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
पंचांग और चौघड़िया देखें
दशामाता व्रत क्या है?
दशामाता व्रत देवी दशा माता को समर्पित एक पारंपरिक व्रत है, जिसे राजस्थान, गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में परिवार की मंगलकामना और संकट निवारण के लिए श्रद्धा से किया जाता है।
यह व्रत सामान्यतः होली के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष दशमी को रखा जाता है। विशेष रूप से महिलाएँ परिवार की समृद्धि, दांपत्य सुख और गृहस्थ जीवन की स्थिरता के लिए पूजा करती हैं।
इस दिन पूजन में कलश, दीपक, रोली, अक्षत, धागा (डोरा) और प्रसाद का विशेष महत्व होता है। व्रत कथा श्रवण और सामूहिक प्रार्थना भी अनेक स्थानों पर की जाती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
दशामाता को परिवार की संरक्षिका शक्ति माना जाता है, जो गृहस्थ जीवन में आने वाली बाधाओं और अस्थिरता को दूर करने का आशीर्वाद देती हैं।
इस व्रत का केंद्र अनुशासन, श्रद्धा और पारिवारिक एकता है। श्रद्धापूर्वक पूजा करने से घर में शांति, सद्भाव और स्थिर प्रगति की कामना की जाती है।
लोक परंपरा में मान्यता है कि दशामाता व्रत से जीवन की बार-बार आने वाली रुकावटें कम होती हैं और परिवार में शुभता बनी रहती है।
मुख्य विधि-विधान
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को शुद्ध करें।
- चौकी पर वस्त्र बिछाकर कलश स्थापित करें और दशामाता का आवाहन करें।
- रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- स्थानीय परंपरा अनुसार डोरा-विधि करें और व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
- दिनभर सात्त्विक आचरण रखें और क्रोध, कटु वचन व विवाद से बचें।
- अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें और परिवार की सुरक्षा व समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
दशामाता पूजा विधि (क्रमवार)
पूजा स्थान को साफ करके लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
कलश में जल भरकर विधिपूर्वक स्थापित करें।
दशामाता का ध्यान कर तिलक, फूल, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें।
डोरा या पवित्र धागे की पूजा कर परिवार के मंगल का संकल्प लें।
दशामाता व्रत कथा का श्रवण/पाठ करें और देवी से रक्षा की प्रार्थना करें।
आरती के बाद मिष्ठान्न या घर का सात्त्विक भोग अर्पित करें।
प्रसाद बांटकर और यथाशक्ति दान देकर व्रत पूर्ण करें।
पारंपरिक पूजन सामग्री
दशामाता व्रत में क्षेत्र अनुसार सामग्री में अंतर हो सकता है, पर सामान्यतः यह वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं:
- रोली, अक्षत, कुमकुम और पुष्प
- घी का दीपक और धूप
- डोरा या पवित्र धागा
- घर का सात्त्विक नैवेद्य या मिठाई
- फल और स्वच्छ जल
- व्रत पूर्ण होने पर दान सामग्री