शीतला अष्टमी: रोगों से रक्षा और स्वास्थ्य की देवी माता शीतला का व्रत

बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगों से सुरक्षा के लिए किया जाने वाला पावन व्रत

तारीख

2026-03-06

मुहूर्त समय

शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त (सूर्योदय)

शुरुआत समय: 6:25 AM

माता शीतला की पूजा, बसोड़ा भोग अर्पण और प्रार्थना के लिए प्रातःकाल सूर्योदय का समय अत्यंत शुभ माना जाता है। आपके चुने हुए शहर के अनुसार सटीक सूर्योदय समय यहाँ प्रदर्शित किया जाता है।

तिथि समय

तिथि शुरू

03:00 AM on Mar 06, 2026

तिथि समाप्त

08:53 PM on Mar 06, 2026

शीतला अष्टमी क्या है?

शीतला अष्टमी एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जो माता शीतला को समर्पित है। माता शीतला को छोटी माता, चेचक, बुखार और संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। यह व्रत होली के बाद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को प्रमुख रूप से उत्तर भारत, राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

इस दिन विशेष रूप से माताएँ अपने बच्चों के स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगों से रक्षा के लिए माता शीतला की उपासना करती हैं। प्रातःकाल स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र धारण कर शीतला माता के मंदिर में जाकर जल, हल्दी, नीम के पत्ते और बसोड़ा भोजन अर्पित किया जाता है।

शीतला अष्टमी को कई स्थानों पर बसोड़ा या बसर्रा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन जो भोजन माता को चढ़ाया जाता है वह पूर्व दिवस (सप्तमी) को पकाकर अगली सुबह ठंडा ही अर्पित किया जाता है। यह पर्व हमें स्वच्छता, सादगी, संयम और स्वास्थ्य के महत्त्व की याद दिलाता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

पुराणों और लोक परंपराओं में माता शीतला को देवी पार्वती या माता दुर्गा का रूप बताया गया है, जो संक्रामक रोगों, बुखार और त्वचा रोगों की अधिष्ठात्री हैं। उनकी कृपा से महामारी, चेचक और बुखार जैसे रोग शांत होते हैं और परिवार स्वस्थ रहता है।

गाँवों और कस्बों में शीतला माता को समाज की स्वास्थ्य रक्षक देवी माना जाता है। उनके मंदिर प्रायः गाँव की सीमा या तालाब के किनारे स्थित होते हैं, जो संकेत देते हैं कि वे बाहरी रोगों और नकारात्मक ऊर्जाओं से पूरे ग्राम की रक्षा करती हैं।

शीतला अष्टमी का व्रत पवित्रता, दान और श्रद्धा के साथ करने से बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित कष्टों का निवारण होता है, परिवार में शांति आती है और पूर्व जन्मों के आरोग्य संबंधी कष्ट भी शांत होते हैं। यह पर्व हमें स्वच्छता, भोजन की पवित्रता और जल की शुद्धता के महत्त्व का बोध कराता है।

मुख्य विधि-विधान और पालन

  • अष्टमी से एक दिन पूर्व (सप्तमी) को ही सरल, सात्त्विक भोजन जैसे खिचड़ी, पूरी, सूखी सब्जी और मिठाई बनाकर स्वच्छ स्थान पर ढककर रख दें।
  • अष्टमी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और यथासंभव दिनभर वाणी और मन की पवित्रता बनाए रखें।
  • शीतला माता के मंदिर जाएँ या घर में उनकी प्रतिमा/चित्र/कलश स्थापित कर पूजा करें। जल, हल्दी, कुमकुम, नीमपत्र, फूल और बसोड़ा भोजन अर्पित करें।
  • रखा हुआ भोजन सबसे पहले माता शीतला को भोग के रूप में अर्पित करें, फिर परिवार और पड़ोसियों में प्रसाद के रूप में वितरित करें।
  • लोक परंपरा के अनुसार इस दिन ताजा गरम भोजन बनाने से बचा जाता है और केवल भोग लगे हुए प्रसाद तथा हल्का, सरल भोजन ही ग्रहण किया जाता है।
  • गरीब, रोगी और बच्चों को भोजन, छाछ, कपड़े या दवाइयाँ दान दें। यह दान रोगों की शांति और पुण्यवृद्धि के रूप में माना जाता है।
  • शीतला माता के स्तोत्र, नामावली या शीतला अष्टक का पाठ करें और पूरे समाज के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें।

शीतला अष्टमी पूजा विधि (क्रमबद्ध विवरण)

सप्तमी के दिन रसोई को अच्छी तरह साफ करें और सात्त्विक भोजन जैसे खिचड़ी, पूरी, सूखी सब्जी, हलवा या लड्डू बनाकर ढककर स्वच्छ स्थान पर रख दें।

अष्टमी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्वच्छ सूती वस्त्र पहनें और दिनभर क्रोध, कटु वचन और अशुद्धता से बचने का संकल्प लें।

पूजा स्थान पर माता शीतला की प्रतिमा, चित्र या कलश स्थापित करें। उसे हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल, नीमपत्र और पीले वस्त्र से सजाएँ।

घी का दीपक और अगरबत्ती जलाकर माता का ध्यान करें। शीतला माता के मंत्र या नामों का जप करते हुए जल, हल्दी, कुमकुम, चावल, नीमपत्र और बसोड़ा भोजन अर्पित करें।

बच्चों, परिवार और पूरे गाँव/नगर के स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगों से रक्षा के लिए विशेष प्रार्थना करें। कुछ समय मौन रहकर माता की शीतल, रोगहरिणी शक्ति का ध्यान करें।

पूजा के बाद भोग लगे हुए भोजन को प्रसाद के रूप में बाँटें। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार दिनभर क्या ग्रहण करना है और क्या नहीं, उसका पालन श्रद्धा से करें।

पारंपरिक भोग और प्रसाद

शीतला अष्टमी पर ठंडे, सरल और सुपाच्य भोजन का महत्व है, जो शरीर में जमी गर्मी और रोगकारक प्रवृत्तियों को शांत करने का प्रतीक है:

  • बसोड़ा खिचड़ी: चावल और दाल की खिचड़ी जो पिछली शाम पकाई जाती है और सुबह माता को ठंडी ही अर्पित की जाती है।
  • मीठा प्रसाद: हलवा, लड्डू या बर्फी आदि जो पहले दिन बनाकर दूसरे दिन भोग के रूप में अर्पित किए जाते हैं।
  • पूरी और सूखी सब्जी: बिना अत्यधिक मसालों और बिना प्याज-लहसुन के बने व्यंजन, जिन्हें प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।
  • छाछ और दही: शरीर की आंतरिक गर्मी को शांत करने वाले ठंडे दुग्ध पदार्थ, जिन्हें माता को अर्पित कर स्वयं भी ग्रहण किया जाता है।
  • नीम के पत्ते और स्वच्छ जल: रोगों और कीटाणुओं से रक्षा का प्रतीक मानकर इन्हें मंदिर और घर के द्वार पर भी लगाया जाता है।