Muhuratam

मुहूर्तम्

भाषा बदलें:Englishहिंदीગુજરાતી

दशामाता व्रत कथा

दशामाता व्रत की संपूर्ण कथा, सरल पूजा-विधि और पारिवारिक सुख-शांति के लिए इसका आध्यात्मिक अर्थ।

दशामाता व्रत कथा क्या है?

दशामाता व्रत की सर्वाधिक प्रचलित कथा राजा नल और रानी दमयंती से जुड़ी है। यह व्रत होली के बाद कृष्ण पक्ष दशमी को विशेष रूप से राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में परिवार की शांति, सुरक्षा और स्थिरता के लिए किया जाता है।

राजा नल और रानी दमयंती की दशामाता व्रत कथा

कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल और रानी दमयंती सुख-संपन्न राज्य करते थे। राज्य में समृद्धि और शांति थी।

होली दसा के दिन एक ब्राह्मणी ने रानी दमयंती को दशामाता का पवित्र डोरा दिया। रानी ने विधि से पूजन करके वह डोरा धारण किया।

कुछ दिन बाद राजा नल ने उस डोरे का महत्व समझे बिना उसे तोड़कर फेंक दिया। उसी रात माता दशामाता वृद्धा रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और चेतावनी दी कि अपमान के कारण शुभ दशा समाप्त होगी।

इसके बाद नल-दमयंती पर विपत्तियां आने लगीं। राज्य, वैभव और सुख छिन गया; उन्हें कष्टमय जीवन और भटकन सहनी पड़ी। कई कथनों में उन पर झूठे आरोप और अपमान का प्रसंग भी आता है।

राजा नल ने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगी। फिर चैत्र कृष्ण दशमी पर नल-दमयंती ने श्रद्धा से दशामाता व्रत, पीपल पूजन, डोरा-विधि और कथा-श्रवण किया। माता की कृपा से उनकी दशा बदली और राज्य-सुख पुनः प्राप्त हुआ।

दशामाता व्रत की सरल विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और शांत पूजा-स्थान तैयार करें।
  2. कच्चे सूत का डोरा बनाएं (परंपरानुसार 10 तार और 10 गांठें) और पूजा में स्थापित करें।
  3. माता दशामाता को कुमकुम, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप और सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें।
  4. पीपल पूजन और परिक्रमा करें (अनेक परंपराओं में 10 परिक्रमा की जाती हैं)।
  5. राजा नल-दमयंती वाली दशामाता व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  6. आरती करके परिवार की स्थिरता के लिए प्रार्थना करें और प्रसाद वितरित करें।

इस व्रत का आध्यात्मिक केंद्र

  • गृहस्थ जीवन में शांति और आपसी समन्वय
  • कठिन समय में मानसिक स्थिरता
  • नियमित, सात्त्विक और अनुशासित जीवन का संकल्प
  • धर्मसम्मत समृद्धि की कामना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या दशामाता व्रत कथा राजा नल-दमयंती से जुड़ी है?

हां। सबसे प्रचलित दशामाता कथा में राजा नल और रानी दमयंती का प्रसंग आता है, जिसमें डोरे के अनादर, विपत्ति और फिर श्रद्धापूर्वक व्रत से दशा सुधरने का वर्णन है।

दशामाता व्रत कब रखा जाता है?

सामान्यतः होली के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष दशमी को, स्थानीय सूर्योदय और तिथि नियम के अनुसार।

क्या विधि हर जगह एक जैसी होती है?

नहीं। डोरा, गांठ, पीपल परिक्रमा और कथा-पाठ की शैली क्षेत्र अनुसार बदल सकती है। उपलब्ध हो तो परिवार की परंपरा का पालन करें।

अपने शहर के लिए दशामाता तिथि और मुहूर्त देखें

तिथि समय, सूर्योदय-आधारित पूजा मुहूर्त और स्थानानुसार सटीक जानकारी के लिए दशामाता पेज खोलें।